डॉ. योगेन्द्रनाथ शुक्ल ने अपनी इन लघु कथाओं
के माध्यम से आधुनिक जीवन के पाखंड, विडंबनाओं
और नैतिक संकटों पर से पर्दा उठाया है। यहाँ हर कहानी एक सवाल पूछती है—कभी
व्यवस्था से, कभी
समाज से, तो
कभी सीधे पाठक की आत्मा से।
भाषा की सरलता और शिल्प की कसावट इन कहानियों
को हर वर्ग के पाठक के लिए सुलभ बनाती है। इस संग्रह में समाहित कहानियाँ महज़
मनोरंजन नहीं, बल्कि
एक सजग रचनाकार की वह पुकार हैं, जो
खोते जा रहे मानवीय मूल्यों को पुन: स्थापित करने की चेष्टा करती है।